शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

आरटीई एक्ट की सबसे अच्छी बात

आरटीई एक्ट की सबसे अच्छी बात मुझे 25 फीसदी क्वोटावाली लगी है, परंतु मेरे एनजीओ के दोस्तों को यह बात विवादास्पद लग रही है. कहते हैं, अमीर बच्चों के साथ गरीबों के बच्चें पढेंगे तो कुंठीत हो जाएंगे. मैं कहता हुं, हमारे बापदादे तो क्लासरूम के दरवाजे पर सबसे पीछे मीट्टी में बैठते थे और पानी पीने के लिए भी तडपते थे. फीर भी उन्हे कोई रोक नहीं पाया. आज स्थिति कई गुना बहेतर है. और वैसे भी हर पीढी को अपने हिस्सा का अपमान का घूंट पीना लाजिमी है, इससे तो हम इन्सान बनते है.

दूसरी बात वे कहते है, इससे नीजीकरण को प्रोत्साहन मिलेगा. भैया, हमारे बच्चों को अच्छी स्कुलो में पढने का मोका मीला और आप क्रान्तिकारी हो गएॽ नीजीकरण से इतना एतराज है तो उठाइए बंदुक, साफ कर देते है, सारे वर्गीय दुश्मनों को. 

फिर, आप कहते हैं कि दलितों के बच्चें अमीरों की स्कुलो में अकेले पड जाएंगे. तो ठीक है, क्वोटा बढाकर पचास फीसदी कर देते हैं, क्लास में वोर होगी तो भी सबको लेवल प्लेइंग फिल्ड मीलेगा. और अमीरों के बच्चों को बचपन से चखने को मीलेगा गरीबों के बच्चों के मुक्कों का स्वाद.

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

होम - सीवीलाइज्ड न्यूसन्स

अहमदाबाद की सीवील अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डो. गणपत वणकरसाहब कहते है, "मेन्टल अस्पताल और जुवेनाइल होम नहीं होते तो पागल और तथाकथित जुवेनाइल अपराधी की ज्यादा परवरीश होती."  आज कल जिस तरह से मेन्टल अस्पतालों और जुवेनाइल होम्स का कारोबार चल रहा है इसे देखकर वणकरसाहब की बात बिलकुल सही लगती है. 33 बच्चे दिल्ली के जुवेनाइल होम को आग लगाकर भाग गए हैं. और मीडीया ने बहस छेड दी है कि इन होम्स में सुरक्षा के इंतजाम कम है! इनको कौन बतायेगा कि हमारे होम civilized nuisance बन चूके हैं.  

गोबेल्स का पोपरगंडा



गुजरात के पूर्व आरोग्यमंत्री जयनारायण व्यास दो दिन से मीडीया में कैग की कुपोषणवाली बात को जूठा साबित करने की कवायत कर रहे है. वह बता रहे थे कि पूरे देश में हर दूसरा बच्चा कुपोषित है, मगर गुजरात में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है (तो यह बूरी बात नहीं है) और कैग ने पांच साल की एवरेज निकाली है. उनका कहना था कि गुजरात में चालीस लाख बच्चों का वजन किया जाता है और उनमें से सिर्फ बीस प्रतिशत बच्चे ही कुपोषित है. श्रीमान व्यास यहां यह बात आसानी से भूल गये कि गुजरात में 0-6 साल के बच्चों की संख्या 75 लाख है. इन सभी बच्चों को नजरअंदाज करके सरकार सिर्फ चालीस लाख बच्चों का वजन कर के कुपोषण कम दिखा रही है. तो यह है गोबेल्स का पोपरगंडा.

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

अगरबत्तियां बांटो, बालमजदूरी खत्म करो





 बीटी कोटन के खेत में बाल मजदूर
 
2001 की जनगणना के मुताबीक गुजरात में करीब 4.50 लाख बाल मजदूर थे. 2011 में 3.50 लाख हूए. हमारी एक आरटीआई अर्जी के जवाब में हमें बताया गया कि 2001 से 2010 के दौरान गुजरात के श्रम विभाग ने 4391 बाल मजदूरों को "मुक्त" करवाया. वैसे तो निजीकरण तथा उदारीकरण के इस दौर में जब तक बाल मजदूर का परिवार पर्याप्त आजिविका नहीं प्राप्त कर सकता तब तक बाल मजदूर मजदूरी से कैसे मुक्ति पा सकता है? और वह भी अगरबत्ती बनाने की एक कीट से, जो गुजरात का श्रम विभाग बाल मजदूर के पुनस्थापन के लिए देता है. हालांकि अगरबत्ती की उत्पाद प्रक्रिया को बाल मजदूरी प्रतिबंधक कानून ने प्रतिबंधित ठहराया है, गुजरात के श्रम विभाग को ऐसी किट बांटने में कोई शर्म नहीं आती. शायद उनका तर्क ऐसा भी होगा कि गुजरात में अगरबत्तियां बनाने के काम में नफा ज्यादा होगा, क्योंकि गुजरात हाइकोर्ट से लेकर सभी सरकारी संस्थानों में भूमि पूजन के लिए बहुत सारी अगरबत्तियों की ज़रूरत पडेगी.


कैसे खेलेगा बचपन?




रास्ते की एक तरफ स्कुल, दूसरी तरफ क्रिंडागण,
 गांव डागला, तहेसील विजयनगर
 
किसी भी रास्ते के आसपास कोई स्कुल है तो "यहां नजदीक में स्कुल है" ऐसी चेतावनी आप देखेंगे. मगर आप गुजरात के आदिवासी क्षेत्र से गुजर रहे हैं तो आपको ऐसा कोई ट्राफीक साइन बोर्ड देखने को नहीं मिलेगा और आप ने रास्ते के एक तरफ प्राइमरी स्कुल और रास्ते की दूसरी तरफ बच्चों का खेल का ऐसा मैदान भी देख लिया तो भी परेशान मत होना. गुजरात के साबरकांठा जीले के विजयनगर तहसील में कई गांवो में ऐसा नज़ारा एक आम बात है.  
 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

हमारा भविष्य

He or she may not be your own child. but they are creating your vibrant Gujarat by sacrificing their study and often their lives. they are creating your 'middle class' heaven where you are comfortable with your conscience.

अगर ये बच्चे कल अपने मालिकों को मार डालेंगे, डाइनेमाइट लेकर इस समाज की संस्थाओं को नष्ट कर देंगे, खतरनाक गुनहगार बन कर आपकी निंद लूंट लेंगे, आतंक फेलायेंगे, तब उन्हे खत्म करने के लिए आप गोलियां चलायेंगे, फास्ट ट्रेक कोर्ट बिठायेंगे, सिक्युरिटिझ के नये उपकरण बसायेंगे, मगर अभी फिलहाल आप कुछ नहीं करेंगे.



 











गुरुवार, 16 अगस्त 2012

गुजरात सरकार की वाइब्रन्ट बाल नीति

लफ़्फ़ाज़ी में ला-जवाब गुजरात सरकार ने बाल मजदूर को दिया है एक नया शब्द - बाल श्रम योगी.



चूंकि सरकार का श्रम विभाग जब इन बाल मजदूरों को मुक्त करवाता है, तब उन की उंगलियों के लेता है निशान और मासूम बच्चे समजते हैं अपने आप को अपराधी. बाल मजदूरी करवाने वाले व्यापारी, मालिकों के नहीं लिए जाते उंगलियों के निशान
तो फिर इन बच्चों को बाल श्रम योगी की जगह बाल श्रम कैदी कहेना उचित नहीं होगा क्या ?
भगवान की तरह ये बच्चें सब जगह पर होते है ................................................
.......................................... गुजरात हाइकोर्ट की केन्टीन में भी
    जब श्रम विभाग इन बच्चों को मजदूरी से मुक्त करवाता है, तब उन्हे पुनस्थापन के लिए देता है अगरबत्ती की कीट
और, बाल मजदूरी प्रतिबंध कानून के मुताबिक अगरबत्ती की उत्पादन प्रक्रिया प्रतिबंधित लीस्ट में है और उसमें बाल मजदूों से काम लेना कानूनन अपराध है.
(स्पष्टता - हमारे ब्लोग पर गुजरात हाइकोर्ट की केन्टीन के इस बाल मजदूर की पोस्ट आने के बाद अब हाइकोर्ट की केन्टीन में ऐसे बाल मजदूर देखे नहीं जाते. अगर आप ऐसा मान लेंगे कि वाइब्रन्ट गुजरात सरकार के प्रगतिशील लेबर डीपार्टमेन्ट ने उस बच्चें का पुनस्थापन करवाया होगा, तो आप गलत सोच रहे है, क्योंक वह बच्चा राजस्थान के डुंगरपुर का था, आदिवासी था, जिनके बारे में खुद गुजरात सरकार नेशनल कमिशन फोर धी प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स की टीम को कह चूकी है कि राजस्थान से आते बच्चों की जिम्मेदारी राजस्थान सरकार की है.)